आतिशबाजियां

नन्ही खुशियों में लिपटी हुई
इन बातों को दें हम एक नया सिला,
नयी यादों को मौका दें हम
इस पहली शुरुआत का,
सिमटे हुए हाथों से बनाये एक नईं दुनिया;
आओ देखें इस नीले अम्बर के तले,
आतिशबाजियां …

घुल जाए हम आसमानों में
रंगों की तरह,
मिल जाएँ हम यूँ खो के
तितलियों की तरह,
के बह जाएँ हम रो के
अश्कों की तरह,
या सो जाएँ हम चुपके से
सपनों की तरह,
होगा हमेशा इन मस्तकों पर हस्ता हुआ,
एक साथ सिले हुए सिलसिलों का आशियाँ,
क्यूँ न देखें हम कुछ देर रह कर यहाँ,
जल के बुझती हुई आतिशबाजियां ?

छू कर देखो मुझे,
कितने हैं अंगार बरसे अब तक जहां,
तुम्हारे नैनों ने है बेपरवाह हमला किया…
कितना टूट चूका हूँ मैं
पंकुरियों की तरह,
उड़ कर हवाओं के साथ अटका हूँ कहीं,
नादाँ पंछियों की तरह,
देखने दो मुझे, थामों ना अब;
इन नाज़ुक आँखों के पानी में डूबी हुई आतिशबाजियां…

आओ देखें हम वोह सपने,
जो धीरे धीरे हो रहे है अपने,
इस दिल के बंद दरवाजों में है जो अब तक द्फ्ने…
छोड़ दो उन्हें, खेलने दो ख्वाहिशों की तरह,
थाम लो हाथ मेरा, पास आओ ज़रा,
खो जाएँ हम परछाइयों की तरह…

जो बाँधा हुआ है जिस्मो-जां का सेहरा,
मुकम्मल होगा अब यह और कहाँ…
लेट जाओ अब अपना है यह सारा जहां,
आओ देखें इस नीले अम्बर के तले,
आतिशबाजियां…

Siddharth Pathak
2nd of October, 2012

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